रायगढ़. रायगढ़ जिला के करमागढ़ स्थित मानकेश्वरी देवी मंदिर में बल पूजा की परपंरा चली आ रही है। शरद पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु मनोकामनाएं पूरी होने के बाद बकरा लेकर पहुंचते हैं। जहां बकरों की बलि दी जाती है और उसका खून बैगा पी जाता है। इस बार तकरीबन 50 से 60 के बीच बकरों की बलि दी गई। जिला मुख्यालय से तकरीबन 27 किमी दूर स्थित करमागढ़ में विराजी मां मानकेश्वरी देवी रायगढ़ राजघराने की कुल देवी हैं। जहां हर साल शरद पूर्णिमा के दिन बल पूजा होता है। इस बार भी दोपहर बाद से बल पूजा शुरू हुई। मंदिर के सामने बैरिकेट्स लगाए गए थे, ताकि अंदर मनोकामना पूर्ण होने वाले श्रद्धालुओं व समिति के सदस्यों के अलावा कोई नहीं हो। दोपहर में रितिरिवाज पूजा-पाठ के साथ बल पूजा शुरू हुई। गांव के बैगा के शरीर में माता का वास हुआ और बलि प्रथा शुरू हुई। समिति के सदस्यों ने बताया कि बैगा के शरीर में देवी आतीं हैं और वो बलि दिए गए बकरों का खून पीती है। श्रद्धालु बैगा के पैर धोते हैं और सिर पर दूध डालकर पूजा करते हैं। बताया जा रहा है कि खून को पीने के बाद भी बैगा के शरीर पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। इस बार भी 50-60 बकरों की बलि दी गई होगी और यह 100 से 120 तक भी चले जाता है। बल पूजा से एक रात पहले निशा पूजा पूरे विधि-विधान के साथ की गई। जब यह पूजा होती है, तो राज परिवार से एक ढीली अंगूठी बैगा के अंगूठे में पहनाई जाती है। हालांकि ये अंगूठी बैगा के नाप की नहीं होती, लेकिन बलि पूजा के दौरान बैगा के अंगूठे में वो अंगूठी पूरी तरह से कस जाती है। इससे एहसास होता है कि अब देवी का वास बैगा के शरीर में हो गया है।
मनोकामनाएं होती है पूरी
रायगढ़ ही नहीं यहां ओड़िसा व दूर दराज के गांव क्षेत्र से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं ने बताया कि यहां मनोकामनाएं मांगने से वह पूरी होती है और जिसकी मनोकामना पूरी होती है वह बकरा लेकर पहुंचता है। साथ ही पूरे क्षेत्र में रात भर मेला का माहौल होता है।
500 साल से चली आ रही परांपरा
मानकेश्वरी समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव ने बताया कि करीब 500 साल से चली आ रही परंपरा आज भी चल रही है। बहुत दूर से श्रद्धालु यहां आते हैं और जिन्हें बाल-बच्चा नहीं हो रहा है और जो भी बीमार से ग्रसित होते हैं वे मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरा हो जाने पर वे बकरा लेकर आते हैं और बकरा की बलि दी जाती है। उन्होंने बताया कि रायगढ़ से राज परिवार आते हैं और बैगा के नवरत्न का अंगूठी पहनते हैं और बाकी दिन ढिला रहता है, लेकिन इस दिन अंगूठी पूरा टाईट हो जाता है। जब तक अंगूठी बैगा के हाथ में रहता है, तब तक देवी का उनके शरीर में रहती है।
मां मानकेष्वरी देवी पर श्रद्धालुओं की बहुत आस्था है
राज्यसभा सांसद व राजपरिवार के देवेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि ये परपंरा रियासतकाल से चली आ रही है। जिस रितिरिवाज को आज भी बरकरार रखे हैं। गांव के लोगों का मां मानकेश्वरी पर बहुत आस्था है। आज करमागढ़ में मानकेश्वरी देवी का पूजा अर्चना किया गया। मंदिर का बहुत मान्यता है जो भी मनोकामना लेकर आते हैं वह पूरा होता है। खासकर जो भी बीमार रहते हैं या जिन्हें संतान की प्रप्ति नहीं हो रही है वे आते हैं और उनकी मनोकामना पूरी होती है। बलि पूजा आदिवासी गोंडवाना प्रथा से यह पूजा बहुत सदियो से चली आ रही है।